गर हो जाए बादलों जैसा जोश हर इन्सां में
कभी तो सूरज को ले लेते हैं अपने आगोश में
गर हो जाए पानी जैसा तेज हर इन्सां
कभी तो पहाडों से रास्ता बना ही ले
बादलों जैसा जोश
Saturday, August 8, 2009Posted by मोहन वशिष्ठ at 4:28 PM
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8 comments:
जोश भर दिया आपने.........
वाह.....
मोहन जी,
इंसान का ही बूता है कि वह आड़ी-तीरछी ऊंची-नीची, गरम-सर्द हर जगह अपना गुजारा कर लेता है। चाहे 50-55 डिग्री तक तपता रेगिस्तान हो चाहे शून्य के नीचे हड़्ड़ीयां जमा देने वाली सर्दी। इसके हौसले पस्त नहीं होते।
waah......kya khoob likha hai.........waqt sabka aata hai bas himmat honi chahiye kuch karne ki..........lajawaab.
bahut khoob !
सुन्दर भाव हैं.....लिखते रहें
सुन्दर है पर इसे पूरा विकसित करिये।
बढि़या है. अमर ज्योति जी से सहमत. इसे आगे बढ़ायें.
मोहन जी
बढिया है
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