गर हो जाए बादलों जैसा जोश हर इन्सां में
कभी तो सूरज को ले लेते हैं अपने आगोश में
गर हो जाए पानी जैसा तेज हर इन्सां
कभी तो पहाडों से रास्ता बना ही ले
बादलों जैसा जोश
Saturday, August 8, 2009Posted by मोहन वशिष्ठ at 4:28 PM 8 comments
फुरसत के लम्हे
Sunday, July 5, 2009
नमस्कार साथियों माफ करना आजकल थोडी दिक्कतें आ रही हैं इसलिए ज्यादा समय नहीं बिता पा रहा हूं आप सभी के साथ। आज आप को थोडा मुस्कुराता देखने को दिल कर रहा है इसलिए आप सभी के साथ एक हास्य कविता सांझा कर रहा हूं जिसे लिखा है हमारे विजय जैन जी ने तो पेश है आपकी खिदमत में फुरसत के लम्हे
हम फुरसत में कुछ लम्हे इस तरह गुजारा करते हैं
होटों से चबाकर मूंगफली, छिलके उन पर मारा करते हैं
एक दिन हमको वो खिडकी पर नजर आ रही थीं
वो हमको देखकर धीरे से मुस्कुरा रही थीं
हम भी उन्हें देखकर मुस्कुराने लगे
हाथ में जो मूंगफली थी, उसे चबाने लगे
उस समय आ रहा था हमें बहुत नजारा
तभी हमने उन पर मूंगफली का छिलका मारा
अचानक सामने से उसका बाप आ टपका
छिलके को उसने रास्ते में ही लपका
छिलका फैंककर बंदूक उसने उठा ली थी
मुझे मारने की कसम जैसे खा ली थी
मुझे भी डर लग रहा था घर से बाहर आने में
इसलिए छिप गया मैं पडोसन के गुसलखाने में
पडोसन के कपडों को भी हम बडे प्यार से निहारा करते हैं
होटों से चबाकर मूंगफली...
उसका बाप पहुंच चुका था अब रास्ते में
मैंने सोचा कि जान जाएगी मेरी सस्ते में
मेरी जान अटक पडी थी एक खूंटी पर
तभी मेरा हाथ चला गया वहां टूटी पर
उधर, उसका बाप गुस्से में लाल पीला हो रहा था
इधर, मैं टूटी के नीच खडा गीला हो रहा था
फिर सोचा कि टूटी को अब बंद किया जाए
उस जल्लाद से बचने का कुछ प्रबंध किया जाए
तेरी याद में गजलें लिख लिखकर रैपर पर उतारा करतें हैं
होटों से चबाकर मूंगफली...
मैंने सोचा कि अब तू बहुत डर चुका
ऐसे नहीं मिल पाएगी तुझे तेरी माशूका
मैं यह सोचकर उसके बाप के सामने आ गया
उसका बाप मुझे देखकर पहले घबरा गया
फिर उसने बंदूक मेरी बाहों में अडा दी
मैंने फुकरा बनकर छाती आगे बढा दी
मेरा फुकरापन उस समय किधर गया
जब उसने गोली चलाई और मैं मर गया
जन्नत में भी हम बैठकर तुझको ही पुकारा करते हैं
होटों से चबाकर मूंगफली...
Posted by मोहन वशिष्ठ at 7:11 PM 15 comments
Labels: हास्य कविता
कविता खो गई
Monday, June 29, 2009कविता खो गई
मेरी अपनी
जिसे लिखा था मैंने
बहुत ही निराले अंदाज में
खो गई कहीं
कहां ढूंढूं
कहां खोजूं
किस किताब में दबी होगी
किताब में होगी भी, या नहीं
कहीं
मेरे भीतर ही तो नहीं खो गई
पता नहीं
क्या सच में मुझसे खो गई
या आंख मिचौली खेल रही है
पता नहीं
क्यों नहीं मिल रही मुझे
मेरी कविता
Posted by मोहन वशिष्ठ at 2:19 PM 18 comments
Labels: मेरी कविता
बेटियां
Tuesday, June 2, 2009बहुत दिनों बाद आज आना हो पाया है आप सभी के बीच। ये 20-25 दिन बहुत भारी बीते और आप सभी को तो बहुत ही याद किया। हर रोज ख्याल आता था कि आज कौन सी पोस्ट और कौन सी कविता आई होगी किसने किसकी पोस्ट उठा कर अपने ब्लाग पर पोस्ट की होगी किसी ने मेरा ब्लाग खोला होगा आदि आदि। दरअसल पिछले दिनों में मेरी बिटिया जो अभी पांचवे साल में चल रही है और उसे डायरिया होने की वजह से अस्पताल में 7-8 दिन तक रहना पडा इस कारण आप सभी से अचानक दूरी बना दी इस डायरिया ने। लेकिन अब वह बिल्कुल ठीक है। इस कारण से 8-10 दिन की दूरी हो गई। फिर एक आफत आ गई हमारे इंटरनेट साहब जी को उनको भी लू लग गई और वो भी छुटटी लेकर चले गए और बना गए आपसे हमारी दूरी कुछ दिन के लिए अब दो दिन पहले ही इंटरनेट साहब पधारे हैं ठीक होकर तो सोचा चलो अब आप सभी के हालचाल पूछ ही लेते हैं। इन दिनों हम अपने बलाग का जन्मदिन भी नहीं मना पाए। क्योंकि 15 तारीख को ही हमारे इस ब्लाग का जन्म हुआ था। अब आप सभी के बीच में आने का मन बना लिया तो नया तो कुछ नहीं बस एक छोटी सी कोशिश की है लिखने की वो आप सभी बताएंगे कि कोशिश कैसी रही। यह कविता मैं अपनी बिटिया को डैडिकेट कर रहा हूं तो आप पढें और बताएं
बेटियां कितनी जल्दी बडी हो जाती हैं
इस बात का पता शायद ही
किसी मां बाप को ना चले
दिन निकल जाते हैं यों ही
अभी कुछ दिन पहले ही तो
उसने चलना शुरू किया था
आज दौडने भी लग गई
अभी कुछ दिन पहले तक तो
ठीक से बोल भी नहीं पाती थी
लेकिन आज गाना गाने लगी
आज जन्मदिन है उसका चौथा
पांचवा भी करीब है
और यूं ही देखते देखते
हो जाएगी बडी
और फिर
उड जाएगी छोडकर पिता का घर
Posted by मोहन वशिष्ठ at 3:27 PM 16 comments
प्यार हो तो ऐसा
Monday, May 11, 2009एक लड़का और एक लड़की..
एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे |
लड़के की मौत के बाद,
उसने लड़की को याद करते हुए कहा..
"एक वादा था तेरा, हर वादे के पीछे..
तुम मिलोगी मुझे हर दरवाजे के पीछे..!
पर तुम मुझसे दगा कर गई..
एक तुम ही न थी मेरे जनाजे के पीछे..!"
पीछेसे एक आवाज आई..
तब लडकेने मुडके देखा, तो वही लड़की खड़ी थी |
लड़कीने कहा..
"एक वादा था मेरा, हर वादे के पीछे..!
मैं मिलूंगी तुम्हे हर दरवाजे के पीछे..!
पर तुमने मुडकर नहीं देखा..
एक और जनाजा निकला था, तेरे जनाजे के पीछे..!"
प्रिय साथियों कुछ दिन पहले मुझे मेरे एक दोस्त ने दिल्ली से एक मेल भेजी जिस में ये कुछ लाईनों की रचना थी पढा तो दिल को छू गई। आज दोबारा से पढा तो सोचा क्यों ना अपने बलाग की शोभा बनाई जाए। यहां पर मैं यह भी बता दूं कि यह रचना मैंने नहीं लिखी है। लेकिन इसके लेखक का नाम भी मुझे नहीं पता है हां यह पता है कि इसे भेजने वाला दोस्त दिल्ली में हैं। तो इस पर किसी को ऐतराज नहीं होना चाहिए। अगर किसी को कोई ऐतराज हो तो मुझे बता सकता है। उसके बाद मैं इसे डिलीट कर दूंगा या महान ब्लागर्स जो भी राय देंगे वह मैं मानूंगा लेकिन मेरा किसी की भी पोस्ट को चोरी करने का कोई इरादा नहीं है इसलिए पढें और बताएं कि क्या ये गलत तो नहीं है
Posted by मोहन वशिष्ठ at 2:48 PM 23 comments
बेटियां
Wednesday, May 6, 2009जब बेटी के होने पर खुशी मनती थी
आजकल क्या हुआ इस दुनिया को
कहां गई वो सुशील सुनैयना
और
वो घर की लक्ष्मी कहलाने वाली
आखिर क्या कसूर है इनका
जो इनको इस जहां में आने से
पहले ही भेज दिया जाता है
दूसरे जहां की ओर
जो आज मां है
कल वो भी किसी की बेटी थी
आज जो पत्नि है
वह भी किसी की बेटी थी
आने दो इस बेटी को
मत छीनो इससे जिंदगी इसकी
एक दिन यही बेटी
पूरी दुनिया की बेटी बनेगी
अपनी मेहनत से
अपनी लगन से
तुम्हारा और देश का
नाम रोशन करेगी
आने दो, आने दो
इस बेटी को आने दो
Posted by मोहन वशिष्ठ at 2:38 PM 23 comments
Labels: भ्रूण हत्या को रोक बेटियां बचाओ
न कोई फूल दामन में मेरे
Friday, April 24, 2009वक्त के कर्कश थपेडों ने
खडा कर दिया आज मुझे
उस मोड पर
जहां से
पीछे हटने का नहीं है हौसला मुझमें
आगे बढने की ताकत नहीं मुझमें
ये एक मोड जिंदगी का मेरे
है खतरनाक
चंद कांटे ही कांटे हैं
न कोई फूल दामन में मेरे
पराए तो पराए ही थे
अब न रहे अपने भी मेरे
चलते थे साथ जो हमेशा
नहीं चलने देते
अब साथ भी अपने
Posted by मोहन वशिष्ठ at 8:17 PM 3 comments